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महर्षि च्यवन ऋषि :- एक संसिप्त परिचय

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भृगु मुनि के पुत्र च्यवन महान तपस्वी थे। एक बार वे तप करने बैठे तो तप करते-करते उन्हें हजारों वर्ष व्यतीत हो गये। यहाँ तक कि उनके शरीर में दीमक-मिट्टी चढ़ गई और लता-पत्तों ने उनके शरीर को ढँक लिया। उन्हीं दिनों राजा शर्याति अपनी चार हजार रानियों और एकमात्र रूपवती पुत्री सुकन्या के साथ इस वन में आये। सुकन्या अपनी सहेलियों के साथ घूमते हुये दीमक-मिट्टी एवं लता-पत्तों से ढँके हुये तप करते च्यवन के पास पहुँच गई। उसने देखा कि दीमक-मिट्टी के टीले में दो गोल-गोल छिद्र दिखाई पड़ रहे हैं जो कि वास्तव में च्यवन ऋषि की आँखें थीं। सुकन्या ने कौतूहलवश उन छिद्रों में काँटे गड़ा दिये। काँटों के गड़ते ही उन छिद्रों से रुधिर बहने लगा। जिसे देखकर सुकन्या भयभीत हो चुपचाप वहाँ से चली गई।
आँखों में काँटे गड़ जाने के कारण च्यवन ऋषि अन्धे हो गये। अपने अन्धे हो जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और उन्होंने तत्काल शर्याति की सेना का मल-मूत्र रुक जाने का शाप दे दिया। राजा शर्याति ने इस घटना से अत्यन्त क्षुब्ध होकर पूछा कि क्या किसी ने च्यवन ऋषि को किसी प्रकार का कष्ट दिया है? उनके इस प्रकार पूछने पर सुकन्या ने सारी…

सक्सेस मंत्र: बुद्धिमान वही, जो गलती करके भी संभल जाए

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एक ऋषि वन में भ्रमण करते समय रास्ता भटक गए। रात होने लगी तो उन्हें एक झोपड़ी नजर आई। उस झोपड़ी में रहने वाले व्यक्ति ने उनका खूब आदर सत्कार किया। सुबह होने पर ऋषि ने उसके आतिथ्य से प्रसन्न होकर उसे जंगल में मौजूद चंदन के बाग के बारे में बता दिया। अगले दिन जब वन में रहने वाला व्यक्ति चंदन के बाग के पास पहुंचा तो उसे चंदन की विशेषताओं के बारे में पता ही नहीं था। उसने चंदन के पेड़ों से लकड़ियां काटना शुरू कर दीं और इन्हें जलाकर उसका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इससे उसकी गुजर बसर होने लगी।

धीरे-धीरे उसने सभी चंदन के पेड़ काट डाले और इसकी लकड़ी को कोयला बनाकर बेच दिया। बस आखिरी पेड़ बचा था। वह जब इस आखिरी पेड़ को काट रहा था, तभी बारिश आ गई। बारिश के कारण चंदन की लकड़ी जली नहीं तो उसने कोयले की जगह बाजार में लकड़ी को बेचने का निर्णय लिया। जब वह चंदन की लकड़ी लेकर बाजार में पहुंचा तो लोगों ने इसे हाथोंहाथ भारी कीमत में खरीद लिया। जब उसे लोगों से चंदन की विशेषता का पता लगा तो वह बहुत पछताने लगा। उसे परेशान देखकर एक ज्ञानी व्यक्ति ने जब कारण पूछा तो उसने बताया कि मैंने इस बहुमूल्य चंदन की …

राजकुमार और बुनकर की बेटी | rajkumar aur bunkar ki beti

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दोस्तों, ये कहानी एक राजकुमार और बुनकर की बेटी की हैं। दोनों में गुण और हुनर को लेकर शर्त लगायी जाती हैं। जिसमें हमें इस कहानी से अच्छी प्रेरणा मिलती हैं। यह एक रोचक कहानी हैं जिसमें आखरी में एक जीतता हैं।


एक राजकुमार था। उस राज्य के राजा और रानी उसे बहुत प्यार करते थे। उस राजकुमार के अंदर सिर्फ एक ही बात थी, की वह बहुत अधिक जिद्दी था।

उसे जिस भी चीज की जरूरत होती, तुरंत उपलब्ध करा दिया जाता था, उसके आदेश पर नौकर चाकर सब हमेशा तत्पर रहते थे।
राजकुमार प्रतिदिन अपने घोड़े पर सवार होकर घूमने निकला करता था। उसके साथ उसके अंगरक्षक सैनिक भी होते थे।

एक समय की बात हैं, राजकुमार अपना घोड़ा दौड़ाते हुए, एक बुनकर के घर के द्वार से गुजर रहा था।


उसदिन बुनकर घर पर नहीं था, उसने बहुत सारा धागा सूखने के लिए द्वार के नजदीक डाला हुआ था।

घर पर बुनकर की बेटी थी, वह बहुत ही सुंदर थी, उम्र में राजकुमार के बराबर ही थी। उसने जब घोड़ो के आने की आवाज सुनी तो वह जल्दी से अपना धागा हटाने लगी।

लेकिन राजकुमार घमण्ड से चूर था, उसके धागा पर थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया और घोड़ा दौड़ाते आगे निकल गया।

बुनकर का पूरा धागा टूट गया, इसपर…

पहचान || अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता

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भारत-रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को करण शर्मा शत शत नमन करता हैं।


श्री मान जी की याद में मैं करण शर्मा उनकी ही लिखी हुई एक कविता प्रस्तुत करने जा रहा हूँ - 
पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी
ऊंचा दिखाई देता है।
जड़ में खड़ा आदमी
नीचा दिखाई देता है। आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,
न बड़ा होता है, न छोटा होता है।
आदमी सिर्फ आदमी होता है। पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को
दुनिया क्यों नहीं जानती है?
और अगर जानती है,
तो मन से क्यों नहीं मानती इससे फर्क नहीं पड़ता
कि आदमी कहां खड़ा है? पथ पर या रथ पर?
तीर पर या प्राचीर पर? फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है,
या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है,
वहां उसका धरातल क्या है? हिमालय की चोटी पर पहुंच,
एवरेस्ट-विजय की पताका फहरा,
कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध
अपने साथी से विश्वासघात करे, तो उसका क्या अपराध
इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि
वह एवरेस्ट की ऊंचाई पर हुआ था? नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा,
हिमालय की सारी धवलता
उस कालिमा को नहीं ढ़क सकती। कपड़ों की दुधिया सफेदी जैसे
मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती। किसी संत कवि ने कहा है कि
मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता,
मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर
उसका मन …

कोटा कचौरी पुराण

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यदि आपने कभी कोटा कचौरी का नाम नही सुना, कभी खाई नही तो मैं बेहिचक मान लूंगा कि आप एलियन हैं।
कोई इस पृथ्वी पर जन्में और बिना कोटा कचौरी खाये मर जाये ये तो हो ही नही सकता।
मैदा से निर्मीत सुनहरी तली हुई कवर के साथ भरे मसालेदार दुष्ट दाल का दल है ये। 
जो सदियों से नशे की तरह दिल दिमाग पर हावी बनी हुई है।
हमारा राष्ट्रीय भोजन है ये। सुबह नाश्ते मे कचौरी हों, दोपहर मे भूख लगने पर मिल जाये ये 
या शाम को चाय के साथ ही इनके दर्शन हो जायें, किसी की मजाल नही जो इन्हे ना कह दे।
कोटा कचौरी का भूख से कोई लेना देना नही होता। पेट भरा है, ये नियम कचौरी पर लागू नही होता। 
कचौरी सामने हों तो दिमाग काम करना बंद कर देता है।
 दिल मर मिटता है कचौरी पर। 
ये बेबस कर देती हैं आपको। 
कचौरी को कोई बंदा ना कह दे ऐसे किसी शख्स से मै अब तक मिला नही हूँ।
कोटा कचौरी मे बडी एकता होती है। इनमें से कोई अकेली आपके पेट मे जाने को तैयार नही होती। 
आप पहली कचौरी खाते हैं तो आँखे दूसरी कचौरी को तकने लगती है, 
तीसरी आपके दिमाग पर कब्जा कर लेती है और दिल की सवारी कर रही चौथी कचौरी की बात आप टाल नही पाते।
कोटा कचौरी को देखते ही आपकी समझदा…

मेरा बचपन

जब  बचपन  था,  तो  जवानी  एक  सपना था...जब  जवान  हुए,  तो  बचपन  एक  ज़माना  था... !!जब  घर  में  रहते  थे,  आज़ादी  अच्छी  लगती  थी...आज  आज़ादी  है,  फिर  भी  घर  जाने  की  जल्दी  रहती  है... !!कभी  होटल  में  जाना  पिज़्ज़ा,  बर्गर  खाना  पसंद  था...आज  घर  पर  आना  और  माँ  के  हाथ  का  खाना  पसंद  है... !!!स्कूल  में  जिनके  साथ  झगड़ते  थे,  आज उनको  ही  इंटरनेट और वाट् सप व फेसबुक पे  तलाशते  है... !!ख़ुशी  किसमे  होतीं है,  ये  पता  अब  चला  है...
बचपन  क्या  था,  इसका  एहसास  अब  हुआ  है... काश  बदल  सकते  हम  ज़िंदगी  के  कुछ  साल...काश  जी  सकते  हम,  ज़िंदगी  फिर  एक बार...!!जब हम अपने शर्ट में हाथ छुपाते थे और लोगों से कहते फिरते थे देखो मैंने अपने हाथ जादू से गायब कर दिये।जब हमारे पास चार रंगों से लिखने वाली एक पेन हुआ करती थी और हम सभी  बटनों को एक साथ दबाने की कोशिश किया करते थे |जब हम दरवाज़े के पीछे छुपते थे ताकि अगर कोई आये तो उसे डरा सके..जाने कहां खो गई वो बचपन की अमीरी जब पानी में हमारे भी जहाज चला करते थे। और आसमान मे हवाई जहाज....जब आँख बंद कर सोने का नाटक करते
थे ताकि…

What is importance of Rajsthan....!

आपने राजस्थान का महत्व - post नही पढ़ा तो कुछ नही पढ़ा।: राजस्थान खास क्यों हैं...?1. हमारे राज्य में बलात्कार के
मामले दिल्ली के मुकाबले... 0/10 है.......
जबकि आबादी दिल्ली से कई
गुना अधिक...!!2. दंगो में हज़ारो लोग यूपी
में मारे गए हैं राजस्थान में 1 भी नहीं ..!!3. Murder Rate 0/10 है , मुम्बई के मुकाबले।4. हमें बेबकूफ समझा जाता है...तो दोस्त सुनो हमारा राजस्थान अकेले इतने
सैनिक देश को देता है , जितना केरला, आन्ध्र-प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात मिलकर भी नहीं दे पाते.....!!5. कर्नल सूबेदार सबसे ज्यादा राजस्थान से है...!!6. उच्च शिक्षण संस्थानों में राजस्थानी इतने हैं कि महाराष्ट्र और गुजरात
मिलाने से भी बराबरी नहीं कर सकते.........7. राजस्थान अकेला ऐसा राज्य है जहाँ किसान कृषि कारणों से आत्म-
हत्या नहीं करतें जैसा कि मीडिया दिखाता है क्यूकि राजस्थान में बुज़दिल नही दिलेर पैदा होते है...!!8. आज भी राजस्थान में सबसे ज्यादा संयुक्त परिवार है...!!9. हम एक रिक्शा चलाने
वालों को भी भाई कह कर
बुलाते हैं...!!" मैं राजस्थान से हूँ " और राजस्थान से ज्यादा महफूज अपने आप को
कहीं नहीं पाता...…

ब्राह्मण की समझदारी

एक ब्राह्मण  बैँक मेँ
गया,और बैँक मेनेजर से रु.50,000 का लोन मांगा.बैँक मेनेजर ने गेरेँटर मांगा.ब्राह्मण ने अपनी BMW कार 🚔जो बैँक के सामने
पार्क की हुई
थी उसको गेरेँटी के तरीके
से जमा करवा दी.मेनेजर ने गाडी के कागज चैक किए,और लोन देकर गाडी को कस्टडी मेँ
खडी करने के लिए
कर्मचारी को सुचना दी ब्राह्मण 50,000 रुपये लेकर चला गया.बैँक मेनेजर और कर्मचारी ब्राह्मण  पर हँसने
लगे और बात करने लगे कि यह करोडपति होते हुए
भी अपनी गाडी सिर्फ
50,000 मेँ गिरवी रख कर चला गया.कितना बेवकुफ आदमी है.😗😗उसके बाद 2 महीने बाद ब्राह्मण वापस बैँक मे
गया और लोन की सभी रकम देकर
अपनी गाडी वापस लेने
की इच्छा दर्शायी.बैँक मेनेजर ने हिसाब-किताब किया और बोला : 50,000 मुल
रकम के साथ 1250 रुपये ब्याज.ब्राह्मण ने पुरे पैसे दे दिए.
बैँक मेनेजर से रहा नही गया और उसने पुछा :
कि आप इतने करोडपति होते भी आपको 50,000
रुपयो कि जरुरत कैसे पड़ी to ब्राह्मण ने  जवाब दिया : मैँ Delhi से आया था.
मैँ अमेरिका जा रहा था.
मेरी फ्लाइट थी.दिल्ली मेँ
मेरी गाडी कहा पार्क
करनी है यह मेरी सबसे
बडी प्रोबलम थी.लेकिन इस प्रोबलम को आपने हल कर दि…